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Saturday, June 16, 2012

ऐसे लोगों को खाना खिलाना बेकार है, क्योंकि.

एक हद के बाद कोई भी कार्य करना बेकार हो जाता है। ऐसे ही कुछ कार्य आचार्य चाणक्य ने बताए हैं।

आचार्य कहते हैं कि-

वृथा वृष्टि: समद्रेषु वृथा तृत्तेषु भोजनम्।

वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवाऽपि च।।

इसका अर्थ है कि यदि समुद्र में वर्षा होती है तो ये व्यर्थ है। जो लोग धनी हैं उन्हें धन का दान करना व्यर्थ है। यदि किसी व्यक्ति ने भरपेट भोजन कर रखा है तो उसे पुन: खाना खिलाना व्यर्थ है। इसके साथ ही दिन के समय में दीपक जलाने का कोई अर्थ नहीं है।

आचार्य चाणक्य कहते हैं- समुद्र में वैसे ही जल ही जल रहता है, ऐसे में वहां वर्षा होना व्यर्थ है। यदि कोई व्यक्ति बहुत धनी है, उसके पास सभी सुख-सुविधाएं उपलब्ध हैं तो ऐसे इंसान को धन का दान करना अर्थहीन माना जाता है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति भरपेट भोजन कर चुका है उसके बाद उसे और भोजन देना व्यर्थ है। भोजन कर चुके व्यक्ति को खाना देने से अच्छा है किसी भूखे व्यक्ति को खाना खिलाना। दिन के समय सूर्य का प्रकाश ही प्रकाश रहता है, ऐसे में दीपक जलाने का कोई अर्थ नहीं है। अंधकार में या रात के समय दीपक जलाने पर ही उसका प्रकाश फैलता है।